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मंगळवार, ३ सप्टेंबर, २०१९

मैं किस्सों में बसता हूँ


उलझा उलझा रहता हूँ 
अफवाओं में घुलता हूँ।   

और उछालो जी भर के  
कीचड़ में ही खिलता हूँ।  

आँख कहाँ लगने वाली  
मैं सपनों से डरता हूँ। 

मौत नहीं छू पाएगी   
मैं किस्सों में बसता हूँ। .. 

हमप्यालों से क्या लेना
मैं साकी पे मरता  हूँ।     ..

एक ख़बर ऐसी भी है 
मैं ख़बरों में रहता हूँ।  

देखा उनका नंगापन 
कपडे मैं ही सिलता हूँ।  

उम्मीदों का मालपुआ 
रोज सवेरे तलता हूँ।  

सुनने वाला कोई नहीं        
खुद अपने को छलता हूँ।  

इस महफ़िल में नूर कहाँ   
आतिशीं को तरसता हूँ।  

- श्रीधर जहागिरदार 
१-९-२०१९

सोमवार, १ जुलै, २०१९

तुम ख़ुदकुशी कर नहीं सकती


तुम बेचैन हो सकती हो
बौख़ला नहीं सकती
तुम लड़खड़ा सकती हो
स्वयं गिर नहीं सकती। ..
तुम नाराज़ हो सकती हो
गुस्सा कर नहीं सकती
किसी कोने में दुबक सकती हो
दहलीज़ लाँघ नहीं सकती
रहस्यों की गुत्थी सहेज सकती हो
सहज उजागर कर नहीं सकती
हाँ, तुम कविता हो सकती हो
नही, कहानी हो नहीं सकती
हत्या हो सकती है तुम्हारी
तुम ख़ुदकुशी कर नहीं सकती
- श्रीधर जहागिरदार

शनिवार, ८ जून, २०१९

मौसम आया है



ज़ख्म हरे करने का मौसम आया है 
वहम को सच कहने का मौसम आया है। .. 

दुवा ही दुवा अबतक देता रहा हूँ  मैं 
दिलों में दर्द पिरोने का मौसम आया है  

इत्र फूलों का मिज़ाज बयाँ करता रहा 
फ़क्र रंगों पर करने का मौसम आया है 

पकड़ ऊँगली चलाया पढ़ाया लिखाया    
उसी पे ऊँगली उठाने का मौसम आया है  

निहत्थे मारे गये सियासत के हर दौर में   
नाज़ कातिलों पे जताने का मौसम आया है 

- श्रीधर जहागिरदार

मंगळवार, १७ एप्रिल, २०१८

बेमानी चर्चा



सुनसान सड़कपर
कुचलकर निकल गई एक कार,

दर्द से बिलबिलाते मासूम पर
झपट पड़े 
पेड़ों पर ताक में बैठे कौए.....


कुत्ते भौंक भौंक कर
चर्चा करते रहे
कार नीली थी, लाल थी या काली;
छोटी थी, बड़ी थी या मतवाली ;
चटपटी चर्चा उसीकी होती है जो विवाद्य हो

कुचलनेवाला आदमी था
इस निःसंदिग्ध बात पर
चर्चा बेमानी थी...
चर्चा समाप्तिपर रोटी भी
उसीकी दी हुई खानी थी !


श्रीधर जहागिरदार
१६-०४-२०१८

रविवार, २५ सप्टेंबर, २०१६

दहशत


सिग्नल पर खड़ा बूढा
हरी बत्ती की प्रतीक्षा में,
नियंत्रण रेखा को सम्मान देता
सहमा सा देख रहा था
बेतहाशा रफ़्तार ज़िन्दगी  की ....

सिग्नल होते ही चल पड़ा
अधिकार भाव से
अपनी नियत रेखा पर
सड़क  पार करने बूढ़ा

कुछ गाडीयाँ फिर भी
होड़ लगाती सी घुसपैठ कर रही थी
उसके चंद पलों की अधिकार रेखा पर...

लड़खड़ाते बूढ़े के डर पर हँस पड़ा
नियंत्रण रेखा पर कब्ज़ा किये बस का चालक...

जमा चुका है
अपनों का दहशतवाद
गहरी जड़े
अंदर तक
बूढ़े की जिंदगी में ....

- श्रीधर जहागिरदार

२३-०९-२०१६

शुक्रवार, ११ मार्च, २०१६

सेवक


रोज सुबह देखता हूँ 
हाथ में कुदाली लिये
चल पड़ते है 'सेवक' …
उम्मीद जागती है
कुछ नया निर्माण होने जा रहा है ...

सुनाई देती है आवाज, खुदाई की
लगातार …  केवल खुदाई की ...
खुश  हूँ नींव पड़ रही है, निर्माण की
अचानक ..  शोर शराबे के बीच
गड़े मुर्दे  निकल बैठते है,
गर्दन पर इसके उसके
फ़ैल जाती है धूल मिट्टी . ...वर्तमानपर
भविष्य निर्माण का कार्य थम जाता है
कल तक के लिए !
अफ़सोस है
इस बार भी गलत साबित हुआ मैं !
सेवकों के चयन में। ..

- श्रीधर जहागिरदार

सोमवार, २ नोव्हेंबर, २०१५

हाशिया

हाशिया है
एक सच्चाई
मानो या ना मानो।

आश्स्वस्त है वो
जो बसता है हाशिये से दूर , 
गर्भस्तर पर
सुरक्षित घेरे में ...

और बनाता है हाशिया
असुरक्षित, उसे
जो रह जाता है किनारे पर
बचता हुआ भीड के रेले से …

हाशिया बसता है
हर मन में, किसी रूप में
छूआ नहीं जा सकता
महसूस होते रहता है .…


हाशिया है
एक सच्चाई
मानो या ना मानो।
- श्रीधर जहागिरदार

शनिवार, १० ऑक्टोबर, २०१५

भीड़

 
आदमी का चेहरा
घुलता जा रहा है
एक भीड़ में ...
आदमखोर भीड़ में …
.
.
.
कुछ दोस्तों को खो चुका  हूँ
.
.
.
डरता हूँ
कहीं मैं भी .... 

.
.
बस अपने
नाखून काट लेता हूँ,
सुबह शाम ... 


नहीं बनना चाहता 
मैं किसी तरह 
किसी ख़बर का हिस्सा !!

- श्रीधर जहागिरदार 

शनिवार, १२ एप्रिल, २०१४

पेड़ की कविता

 
जी हां, ये पेड़ की कविता है....

सही  पूछा   ....

पेड़ की कविता है तो
शब्दों में खुश्की कैसे ?
रूप इसका साधारणसा क्यूँ  ?
बिखरे सपनोंसी हर पंक्ती इसकी
बेतरतीब है क्यूँ ?
क्यूँ पढते हुए छूट जाता है मुँह में
स्वाद कसैला राखसा ?

ठीक ही  कहते हो ....

कौंधती बिजली गिरनेसे
पूरी तरह झुलसे, चरमराये
मेरे हरेभरे पेड़ की
यह अंतिम कविता है  !

सम्हल लो …

चमन आपका भी बहार पर है  …
और कड़कना बिजली का
शायद  जारी रहे

पूरे बहार पर हो पेड़ तभी
बिखरकर होना उसका धाराशायी …

नहीं झेल पाता ऐसी पीड़ा हर कोई !

- मूल मराठी रचना : अमेय पंडित
- अनुवाद : श्रीधर जहागिरदार

मंगळवार, १ एप्रिल, २०१४

दूरी


मेरे शहर से तुम्हारे गांव को जोड़नेवाली सड़क
उसपर होने वाली बारीश
सच कहूँ तो समान होती है


मगर जब भी होती है, तुम्हारे माथे पर उग आती है
चिंता की लकीरें,  और
आते हीजहन में बो देती है सवाल
तुम्हारे टिकाव का …
समय पर आयेगी ? काफी होगी या.…
अकाल? सूखा ? बाढ़ ?

और सड़क के शहर छूने वाले इस छोर पर मै हूँ ,
बारीश की बूंदें झेलते,
दो चार ओलों को सहेजते हुए..... 

जब भी आती है
बारीश , मेरे लिए होती है वो
मन भावन गीली मिट्टी की सौंधी खुशबू,
सरसराती हरीभरी किसीकी यादें
,
मेरी कल्पना में बसे सुख दुखोंको सहलाने वाली बौछार,
मेरी तरोताजा अंत:प्रेरणा …
इन सब में याद ही नहीं रहता बारीश का तांडव, जिस में बह चुकी थी
जरूरतें
तुम्हारे टिकाव की ....

सड़क के शहरवाले इस छोर पर मैं
और उस छोर पर मुझे न दिखाई देनेवाले तुम
अंत:प्रेरणा और एहसास के बीचकी यह दूरी
क्या कभी मिट पायेगी मुझसे?

मूल रचना : विभावरी बिडवे
अनुवाद: श्रीधर जहागिरदार

मूल रचना
अंतर
****
माझ्या शहरातून तुझ्या गावाकडे
जाणाऱ्या रस्त्यावर पाऊस सारखाच असतो खरंतर!

मात्र तो कधीही आला तरी
त्या टोकाला असते एक विवंचना.
तो कधीही आला तरी घेऊन येतो
टिकावाचा प्रश्न….
वेळेत येईल? आणि आलाच तर पुरेसा?
दुष्काळ, अवर्षण?


मात्र रस्त्याच्या शहरात घेऊन येणाऱ्या
ह्या टोकाला मी असते पाऊस झेलत…
चारदोन गारा वेचत…
पाऊस कधीही आला तरी माझ्यासाठी असतो तो
चित्तवृत्ती बहरून टाकणारा,
मातीच्या वासाने
भावनांना दाहवणारा,
कोणाच्या आठवणी कुरवाळणारा….
माझ्या काल्पनिक सुख दुखाःला गोंजारणारा…
माझ्या अंतप्रेरणेला जागवणारा….


त्यामध्ये मी विसरून जाते पावसाचं तांडव,
ज्या पावसात वाहून गेलेली असते
तुझी टिकावाची मुलभुत गरज….

रस्त्याच्या शहरातल्या ह्या टोकाला मी
आणि त्या टोकाला मला न दिसणारा तू…
अंतप्रेरणे पासून जाणीवांपर्यंतचं हे अंतर
कधी होणार पार मझ्याकडून…. ?

  विभावरी
 

रविवार, २२ सप्टेंबर, २०१३

अनकही


मैंने कब कहा
बचाओ मुझे मेरी पीड़ा से,
फिर भी चले आते हो तुम
मुझे सम्हालने...

मै रो भी नहीं पाता
रिश्ते के लिहाज से....

आज फिर एक कविता
अनकही रह गई!!

- श्रीधर जहागिरदार

गुरुवार, १० जानेवारी, २०१३

एक साल गुजर गया ...


एक साल गुजर गया, क्या कर गुजर गया?
क्या बना ? क्या मिटा? सवाल कर गुजर गया  ...
..
यह रचा, वह रचा, मात्र था हल्ला मचा,
ईंट पत्थर दिखते नहीं, बवाल कर गुजर गया ...  

..
कलकल करता होगा 'कल', नहीं छलेंगे कोई छल  
ऐसी आशा प्रतिदिन मेरी वो हलाल कर गुजर गया ..
..
आते  जाते रहे ऋतू , छोड़ गए वे मनमें किन्तु 
कांटे साबुत टहनी पर, फूल मसल कर गुजर गया ..
..
घरवालों का क्या कहना, दुश्मनों से है याराना
हासिल था जो कुछ मिला वो फिसल कर गुजर गया ....
..
महफ़िल में आया सही, पर कोई शिरकत नहीं
ना किसीने था पुकारा, बस टहल कर गुजर गया ...
..
रोज बदलता रहा वो बाट, खोजे नये नये थे घाट,
जहाँ भी ऊबा उसको छोड़, नई पहल कर गुजर गया  ... 
...
बस, एक बूंद की खुशबू से, अंकुर फूटे धरतीसे,
दूब का कोमल स्पर्श मिले... ये खयाल कर गुजर गया ...  


- श्रीधर जहागिरदार
१०-१-२०१२











रविवार, १६ डिसेंबर, २०१२

नौका

फुर्सत ही फुर्सत है अब, 
तालाबंद यादोंको खोल फिर समेटने के लिए !


मिल जाते हैं अनायास,
दराज के कोने में छुपे पड़े निशान,
पुराने फोटो, कुछ ख़त, धुलसना हार्मोनिका
और बिखरे पन्ने कविताके ....

हर चीज उलझी हुई ,पगलाये जज्बतोंमें ...
चौंध जाता है मनोमस्तिष्क में इतिहास,
बने -संवरे, टूटे-बिगड़े, सकपकाए पलों का, ..

व्यवहार दक्ष, कर्तव्य दक्ष,
सामाजिक प्रतिमा दक्ष.
दक्ष, दक्ष, दक्ष..
पारीवारिक सुरक्षा, बस एकही.. लक्ष्य!

कैसे गुजरा उसके बाद समय, पता न चला ...

हर कोई अब मगन अपने आप में, और मैं
बैठा हूँ, नदीके प्रवाह में पैर छोड़कर ...
इस पार की यांदोको संजोकर,
उस तट पर आँख गडाकर ...

हिलोरे खाती, होगी आती
एक नौका बिन माझी की,
होले होले; पाल पर
मेरा नाम लिखवाकर ...

तब तक, रहने दो,
शब्दों के टुकडे पास मेरे ,
बीत ही जायेगा समय
कलिडिओस्कोप में डालकर ...

- श्रीधर जहागिरदार
(मेरी मराठी कविता "होडी " का अनुवाद )

शुक्रवार, १४ डिसेंबर, २०१२

जाड़े की एक शाम


दिन ठंडा पड़ता जा रहा है ...
सूरज की किरणे बदन से
लिपटती है, लेकिन
खून खो चुका है
अपनी रफ़्तार . . .

पत्ते भी झरने शुरू हो गए है,
कब कौन सा बिखरेगा
मालूम नहीं ... शायद ...
लेकिन बिखरेगा जरूर
हर पत्ता ....

"बाग की उस बेंच पर वह
बूढ़ा नहीं दिखा कई दिन से ..."
तुमने सहज भाव से पूछा
एक शाम टहलते ।

"कही वो ......"

अन्दर, कही, कुछ
टूट रहा है ...
सुन सकता हूँ मै...
... सन्नाटा शोर मचाता ...

अच्छा लगा, तुमने
शाल ठीक से ओढ़ दी ...
ढाढस कर मैंने अपनी
चाल तेज कर दी ....



- श्रीधर जहागिरदार

मंगळवार, ११ डिसेंबर, २०१२

दिया और बाती : मेघा देशपांडेजी की एक बेहतरीन कविता का अनुवाद



बुझने को होती है बाती,
तब सुलगते है दो प्रश्न 
दिये के मन में -
" क्या मिला मुझे दान में?"
" क्या मुझे दान मिला?"

अनंत कालसे सांजबेला पर 
कोई डाल रहा है तेल दिये में .. , 
तलेकी मिट्टी ने भी 
गुदवा लिया है उसकी रिसती धारासे ...
फिरभी ... बुझने को होती है बाती, तब .....

जलभुन उठता है दिया
देख झिलमिलाती दीपमाला
किसी गोपुर* के सम्मुख,
मन में सोचे, गर्भगृह में प्रदिप्त 
दीपशिखा है ज्यादा मोहक,
पूजा की थाली में सजते 
आरती के दिये में 
लौ बन जलना अधिक है सार्थक ...
जुड़ही  जाते है दो हाथ अनायास 
इसकी सोहबत के साथ प्रति दिन ..
लेकिन फिरभी, बुझने को होती है बाती , तब ...
       
धन्य धन्य हो जाता है, 
जब मिलकर कई ज्योती संयमसे  
है पकाती किसीका
 भोजन;
ज्योती ऐसी कितनी है जो 
अपनी उर्जा कर समर्पण 
गर्म करे दुसरोंका तन, 
जलने का बस सार यही,
यही मानता असली जीवन !!

देखी है उसने भूखी ज्वाला 
बेरहम, बेशरम, शैतानी हाला
खुशहाल घरोंदे बने निवाला ....
लेकिन फिरभी, बुझने को होती है बाती, तब ...
सुलगते है दो प्रश्न दिये के मन में  ..

बन मशाल, पथ आलोकित करना 
ध्येयशाली लगता है,
मंदिरोंमें सुलगती धुनी में जलना 
भाग्यशाली लगता है  ...
दो जुड़े हाथों के पीछे, 
मनके अंधकार से 
नित उभर आती है आशा की किरण नई  ...
फिरभी यहाँ, बुझने को होती है बाती, तब ....

जानता है,यहीं कहीं हराभरा समृद्ध वन 
लपलपाती 
अगम्य प्रक्षुब्ध ज्वालाओने
निगला है;
पूरा गाँव  तबाह कर गुजरी बाढ़ में 
भीग चुकी काठी काठी के अंतर में 
है सिसकती, चूल्हे में जल उठने 
दर्द समेटे अधीर ज्योती ...
इसने सुना है ....

कोई नहीं स्वयंसिद्ध यहाँ , फिर भी ..
हर दिन, दो हाथ इर्दगिर्द 
कर देते है ओट ... 
सुलभ जनम लेती है ज्योत
रहता इसका वंश सुरक्षित ...   
लेकिन फिरभी, बुझने को होती है बाती, तब ...
सुलगते है दो प्रश्न दिये के मन में  ..
   ...................
दूर कही .. वहां  ... 
बन कर अंश अज्ञात का 
रह गई ...
भूली-बिसरी ..
एक बत्ती .... 
शायद सुलगे, शायद ना भी ...
संभावना में 
इस 
जडी हुई ..पड़ी हुई ..
 ..
...ऐसेही ...
हर शाम ...
इस कल्पनासे खुश होती
...हजारो दिये जल उठे होंगे आज
 ...
..मैं घड तो पाई .. बस ये  है मेरा दान ...  
पहचानती ..
तेल ,दिया, दो हाथ ...
प्रतीक्षा इनकी ...इसे प्रयोजन मानती ....

फिरभी यहाँ 
बुझने को होती है बाती , तब ...
हर दिन जलने वाले 
 दिये के मन में
सुलगते है दो प्रश्न   ..

रचनाकार : मेघा देशपांडे, नागपुर 
- अनुवाद: श्रीधर जहागिरदार
गोपुर*  मंदिर का प्रवेशद्वार 


शुक्रवार, ३० नोव्हेंबर, २०१२

तस्मै श्री गुरुवेनमः


शिक्षक दिवसपर 

ना हाथ मेरा पकड़,लिखवाया होता,
ना पकड़ कर कान मेरा,पढवाया होता,
ना रटाये होते पहाड़े, दहाड़े मार कर,
पत्थर फोड़ रहा होता, मैं हार कर ...

ना थपथपाई होती पीठ मेरी,
ना सराही होती प्रतिभा मेरी,
मैं वहीँ गाँव में भैंस चराते रहता
साहूकार का सूद निभाते रहता...

तुम बने ब्रह्मा मेरे,मैं हुआ सहज रचित,
विष्णुसा स्पर्श कर,रक्खा मुझे स्वयं चलित,
महेशसी तीसरी नजर, होता रहा मोह भस्मित,
परब्रह्मसे बसे मुझमे, कैसे हुआ? मैं चकित!

बारिश


घिर आये थे बादल अचानक से


मै सुन रहा था तलत उस शाम,...
दिल को तार तार करने वाले गीत..


सहसा तुम उठ कर चल दी,
बारिश तुम्हारी आंखोमे आ बसी थी!
वापस आ तुमने झटके से बंद कर दिया गाना..

बारिश भी कभी बंद कर सकोगी तुम?


- श्रीधर जहागिरदार

बुधवार, २८ नोव्हेंबर, २०१२

फूल, पंछी और जख्म

भीतर भीतर ... मन के  अंदर ...
फूल एक महकता है,
खुशबू अपनी फ़ैलाने
पवन हिलोरे ढूंडता है....
(...महक यहांसे दूजे मन में,
बस, बसाना चाहता है,
नदी किनारे किसी मंदिर को
सहज सजाना चाहता है ...)

भीतर ... भीतर ... गहरे अंदर  ...
एक है पंछी, फडफडाता,
छुटकारा पा कारा से
उडान भरने कसमसाता  ... 
(...कभी चाहता, खुलकर गाये,
कभी सोचता नभ पर छाये ..
कभी डाल पर मौन बैठकर,
पत्तोपत्तो में खो जाये ...)

गहरे ..  गहरे .. अंतर तल पर ...
एक जख्म, निरंतर रिसता,
भेद जन्मका सुलझाने में 
मृत्यु से जाकर है मिलता  ... 
(...उसने कभी न चाहा भरना,
स्मृतियों से न चाहा लड़ना,
'जीवन' ये नाम पाकर
उसने चाहा था ,बस, जीना ...)

- श्रीधर जहागिरदार
२८-१२-२०१२

सोमवार, २६ डिसेंबर, २०११

हैपी बर्थ डे


हर साल कि तऱ्ह
फिर खिल उठा ये दिन...
खुशबू बचपनकी सोंधिसी
मन को छू रही बार बार..

माँ ने बिन कहे बनाया था हलुआ
बाबा ने  लालाकी दुकानसे लाई  कुल्फी...
शामको दोस्तोके साथ सिनिमा देखनेकी मिली  इजाजत ..
भगवान के सामने जला दीप  और
सर पर माँ बापूका  हाथ ...

हर साल कि तऱ्ह
फिर खिल उठा ये दिन...

कॉलेज  कैंटीन में पूरी टोली थी हाजिर 
नाम से मेरे किसीने दे रखा था  आर्डर 
कचोडी- समोसे और क्या क्या, याद नहीं
मन जोड़ रहा था महीने के बचे दिनों का हिसाब!
और पूरी ज़िन्दगी का हिसाब जुड़ गया, जब
सहसा थाम लिया था हाथ उस कोमल हाथने...

हर साल कि तऱ्ह
फिर खिल उठा ये दिन...

सुबह सुबह नन्हे हाथ जगा रहे थे
"पापा पापा" की किल्गारिया
और कागज़ पर रंगों से बना स्कैच मेरा!
साथ में पूरा परिवार, हाथ में हाथ थामे,
हैपी बर्थ डे .. एक केक और ढेर प्यार ...

अगले वर्ष फिर खिल उठेगा ये दिन
कुछ नये रंग होंगे जिंदगीके लिये
तब तक अपनोके के संदेशो की सोंधी खुशबू
साथ निभाएगी!



बुधवार, १२ ऑक्टोबर, २०११

देखता हूँ मुड़कर मै जब


देखता हूँ मुड़कर मैं जब, लगता नहीं यह फासला,
कर लिया पार मैंने, दो दशक का सिलसिला।

इस दौड़ में कई मोड़ थे, हर मोड़ पर था काफिला,
शामिल हुआ मैं जहाँ, हर शख्स था काबिल मिला. 


दहशत भरी थी जब हवा, मैं जमींपर ही चला,
हाथ बढ़ता, साथ देता हर जगह इन्सान मिला. 



होड़ है जीनेकी बाहर, जीनेकी मगर   फुर्सत नही,
एक पल थमकर यहाँ, जीनेका था मक्सद मिला. 

हसरत थी, मैं फूल बन, महकू किसी बाग़ में,
अदनासा ख्वाब मेरा, आकर यहाँ हाँसिल मिला.

--- श्रीधर जहागिरदार

(Standard Chartered Bank से जून २०१० मे सेवा निवृत्तीपर रचित मेरे मनोभावो को उजागर करती रचना )