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शनिवार, १२ एप्रिल, २०१४

पेड़ की कविता

 
जी हां, ये पेड़ की कविता है....

सही  पूछा   ....

पेड़ की कविता है तो
शब्दों में खुश्की कैसे ?
रूप इसका साधारणसा क्यूँ  ?
बिखरे सपनोंसी हर पंक्ती इसकी
बेतरतीब है क्यूँ ?
क्यूँ पढते हुए छूट जाता है मुँह में
स्वाद कसैला राखसा ?

ठीक ही  कहते हो ....

कौंधती बिजली गिरनेसे
पूरी तरह झुलसे, चरमराये
मेरे हरेभरे पेड़ की
यह अंतिम कविता है  !

सम्हल लो …

चमन आपका भी बहार पर है  …
और कड़कना बिजली का
शायद  जारी रहे

पूरे बहार पर हो पेड़ तभी
बिखरकर होना उसका धाराशायी …

नहीं झेल पाता ऐसी पीड़ा हर कोई !

- मूल मराठी रचना : अमेय पंडित
- अनुवाद : श्रीधर जहागिरदार

मंगळवार, १ एप्रिल, २०१४

बंद आवाज की आहट

होठों का दरवाजा पिटती है कई बार, अंतरात्मा की आवाज , मगर
खड़ा रहता है बाहर पहरा देता  स्वार्थ ....

मन की दीवारपर लगा पाऊँ माँ की तस्वीर
इतनी भी जगह मन में नहीं छोड़ी थी बिबीने
मगर हाँ, मन में थी कहीं एक अटारी,
खुश थी माँ,  उस अटाला भरी अटारी में ....

चूल्हे की लकड़ीयों में दिखता था बाप
और तवे पर माँ , मेरे लिए जलते हुए …

कभी कभी साग रोटी खाते हुए
रोटी बन जाती है हाथ और खिलाती है साग,
जैसे माँ खिलाती थी  ....

कुछ दिन और जिंदा रह सकते थे न वो ?
यह सवाल, " तुम्हारी तनख्वाह क्यों नहीं बढ़ी?"
पत्नी के इस सवाल के आगे टेक देता था घुटने  ....


धूलसने सपने छोड़, सुबह जागकर
रोजमर्राकी मांगोसे मटमैला हुआ पानी बदनपर उंडेल
जिसका कभी लिहाज न कर सका उस भगवन के सामने सिगरेट सुलगाकर ,
अगरबत्ती ब्याग में भरकर ऑफिस में जलाता बॉस के सामने।


मगर कही  … कभी खुला आसमान बन
कभी कानून बन, तो कभी मेरी बेटी के रूप में
मिलती माँ और समझाती  …

शराब मुझे पीती थी, तब यादोंके चने
छिटक कर गिरते टेबल के नीचे
उन्हें उठाते उठाते सर से टकराए टेबल में
बाप भी होता था कहीं  ....
टेढ़ी मेढ़ी चाल से देह पहुँचती जब घर
अंतरात्मा की आवाज ने कई बार
पीटा था होठोंका दरवाजा
लेकिन बाहर पहरा देता खड़ा था स्वार्थ   …
बस कुछ और नहीं …


मूल मराठी रचना : नि:शब्द(देव)
अनुवाद : श्रीधर जहागिरदार

दूरी


मेरे शहर से तुम्हारे गांव को जोड़नेवाली सड़क
उसपर होने वाली बारीश
सच कहूँ तो समान होती है


मगर जब भी होती है, तुम्हारे माथे पर उग आती है
चिंता की लकीरें,  और
आते हीजहन में बो देती है सवाल
तुम्हारे टिकाव का …
समय पर आयेगी ? काफी होगी या.…
अकाल? सूखा ? बाढ़ ?

और सड़क के शहर छूने वाले इस छोर पर मै हूँ ,
बारीश की बूंदें झेलते,
दो चार ओलों को सहेजते हुए..... 

जब भी आती है
बारीश , मेरे लिए होती है वो
मन भावन गीली मिट्टी की सौंधी खुशबू,
सरसराती हरीभरी किसीकी यादें
,
मेरी कल्पना में बसे सुख दुखोंको सहलाने वाली बौछार,
मेरी तरोताजा अंत:प्रेरणा …
इन सब में याद ही नहीं रहता बारीश का तांडव, जिस में बह चुकी थी
जरूरतें
तुम्हारे टिकाव की ....

सड़क के शहरवाले इस छोर पर मैं
और उस छोर पर मुझे न दिखाई देनेवाले तुम
अंत:प्रेरणा और एहसास के बीचकी यह दूरी
क्या कभी मिट पायेगी मुझसे?

मूल रचना : विभावरी बिडवे
अनुवाद: श्रीधर जहागिरदार

मूल रचना
अंतर
****
माझ्या शहरातून तुझ्या गावाकडे
जाणाऱ्या रस्त्यावर पाऊस सारखाच असतो खरंतर!

मात्र तो कधीही आला तरी
त्या टोकाला असते एक विवंचना.
तो कधीही आला तरी घेऊन येतो
टिकावाचा प्रश्न….
वेळेत येईल? आणि आलाच तर पुरेसा?
दुष्काळ, अवर्षण?


मात्र रस्त्याच्या शहरात घेऊन येणाऱ्या
ह्या टोकाला मी असते पाऊस झेलत…
चारदोन गारा वेचत…
पाऊस कधीही आला तरी माझ्यासाठी असतो तो
चित्तवृत्ती बहरून टाकणारा,
मातीच्या वासाने
भावनांना दाहवणारा,
कोणाच्या आठवणी कुरवाळणारा….
माझ्या काल्पनिक सुख दुखाःला गोंजारणारा…
माझ्या अंतप्रेरणेला जागवणारा….


त्यामध्ये मी विसरून जाते पावसाचं तांडव,
ज्या पावसात वाहून गेलेली असते
तुझी टिकावाची मुलभुत गरज….

रस्त्याच्या शहरातल्या ह्या टोकाला मी
आणि त्या टोकाला मला न दिसणारा तू…
अंतप्रेरणे पासून जाणीवांपर्यंतचं हे अंतर
कधी होणार पार मझ्याकडून…. ?

  विभावरी
 

रविवार, १६ डिसेंबर, २०१२

नौका

फुर्सत ही फुर्सत है अब, 
तालाबंद यादोंको खोल फिर समेटने के लिए !


मिल जाते हैं अनायास,
दराज के कोने में छुपे पड़े निशान,
पुराने फोटो, कुछ ख़त, धुलसना हार्मोनिका
और बिखरे पन्ने कविताके ....

हर चीज उलझी हुई ,पगलाये जज्बतोंमें ...
चौंध जाता है मनोमस्तिष्क में इतिहास,
बने -संवरे, टूटे-बिगड़े, सकपकाए पलों का, ..

व्यवहार दक्ष, कर्तव्य दक्ष,
सामाजिक प्रतिमा दक्ष.
दक्ष, दक्ष, दक्ष..
पारीवारिक सुरक्षा, बस एकही.. लक्ष्य!

कैसे गुजरा उसके बाद समय, पता न चला ...

हर कोई अब मगन अपने आप में, और मैं
बैठा हूँ, नदीके प्रवाह में पैर छोड़कर ...
इस पार की यांदोको संजोकर,
उस तट पर आँख गडाकर ...

हिलोरे खाती, होगी आती
एक नौका बिन माझी की,
होले होले; पाल पर
मेरा नाम लिखवाकर ...

तब तक, रहने दो,
शब्दों के टुकडे पास मेरे ,
बीत ही जायेगा समय
कलिडिओस्कोप में डालकर ...

- श्रीधर जहागिरदार
(मेरी मराठी कविता "होडी " का अनुवाद )

मंगळवार, ११ डिसेंबर, २०१२

दिया और बाती : मेघा देशपांडेजी की एक बेहतरीन कविता का अनुवाद



बुझने को होती है बाती,
तब सुलगते है दो प्रश्न 
दिये के मन में -
" क्या मिला मुझे दान में?"
" क्या मुझे दान मिला?"

अनंत कालसे सांजबेला पर 
कोई डाल रहा है तेल दिये में .. 
तलेकी मिट्टी ने भी 
गुदवा लिया है उसकी रिसती धारासे ...
फिरभी ... बुझने को होती है बाती, तब .....

जलभुन उठता है दिया
देख झिलमिलाती दीपमाला
किसी गोपुर* के सम्मुख,
मन में सोचे, गर्भगृह में प्रदिप्त 
दीपशिखा है ज्यादा मोहक,
पूजा की थाली में सजते 
आरती के दिये में 
लौ बन जलना अधिक है सार्थक ...
जुड़ही  जाते है दो हाथ अनायास 
इसकी सोहबत के साथ प्रति दिन ..
लेकिन फिरभी, बुझने को होती है बाती , तब ...
       
धन्य धन्य हो जाता है, 
जब मिलकर कई ज्योती संयमसे  
है पकाती किसीका
 भोजन;
ज्योती ऐसी कितनी है जो 
अपनी उर्जा कर समर्पण 
गर्म करे दुसरोंका तन, 
जलने का बस सार यही,
यही मानता असली जीवन !!

देखी है उसने भूखी ज्वाला 
बेरहम, बेशरम, शैतानी हाला
खुशहाल घरोंदे बने निवाला ....
लेकिन फिरभी, बुझने को होती है बाती, तब ...
सुलगते है दो प्रश्न दिये के मन में  ..

बन मशाल, पथ आलोकित करना 
ध्येयशाली लगता है,
मंदिरोंमें सुलगती धुनी में जलना 
भाग्यशाली लगता है  ...
दो जुड़े हाथों के पीछे, 
मनके अंधकार से 
नित उभर आती है आशा की किरण नई  ...
फिरभी यहाँ, बुझने को होती है बाती, तब ....

जानता है,यहीं कहीं हराभरा समृद्ध वन 
लपलपाती 
अगम्य प्रक्षुब्ध ज्वालाओने
निगला है;
पूरा गाँव  तबाह कर गुजरी बाढ़ में 
भीग चुकी काठी काठी के अंतर में 
है सिसकती, चूल्हे में जल उठने 
दर्द समेटे अधीर ज्योती ...
इसने सुना है ....

कोई नहीं स्वयंसिद्ध यहाँ , फिर भी ..
हर दिन, दो हाथ इर्दगिर्द 
कर देते है ओट ... 
सुलभ जनम लेती है ज्योत
रहता इसका वंश सुरक्षित ...   
लेकिन फिरभी, बुझने को होती है बाती, तब ...
सुलगते है दो प्रश्न दिये के मन में  ..
   ...................
दूर कही .. वहां  ... 
बन कर अंश अज्ञात का 
रह गई ...
भूली-बिसरी ..
एक बत्ती .... 
शायद सुलगे, शायद ना भी ...
संभावना में 
इस 
जडी हुई ..पड़ी हुई ..
 ..
...ऐसेही ...
हर शाम ...
इस कल्पनासे खुश होती
...हजारो दिये जल उठे होंगे आज
 ...
..मैं घड तो पाई .. बस ये  है मेरा दान ...  
पहचानती ..
तेल ,दिया, दो हाथ ...
प्रतीक्षा इनकी ...इसे प्रयोजन मानती ....

फिरभी यहाँ 
बुझने को होती है बाती , तब ...
हर दिन जलने वाले 
 दिये के मन में
सुलगते है दो प्रश्न   ..

रचनाकार : मेघा देशपांडे, नागपुर 
- अनुवाद: श्रीधर जहागिरदार
गोपुर*  मंदिर का प्रवेशद्वार